Friday, May 10, 2013

दोस्त की आशिकी



आंसुओं से अपनी किस्मत लिख दी है
जबसे तुमसे मुहब्बत कर ली है
ना दूर मैं जा सकता हूँ
ना इजहार-ए-इश्क कर सकता हूँ
कहती है तू इस दोस्ती के पाक दामन में
यह लफ्ज गवारा नहीं
कैसे समझायूं तुझे कि मेरी मुहब्बत में
छुपी है दोस्ती की गहराई कहीं
शायद ये वक़्त गुजर जायेगा
आने वाले कल में आज भूला बिसरा हो जायेगा
धूल जम जायेगी यादों की तस्वीरों पर
फिर भी इस की में दोस्त नजर आयेगा

Saturday, January 19, 2013

I Just want


I just want to sleep
but my eyes are still wide open
dreaming of her

I just want to relax
but my mind is still in chaos
waiting of her call

I just want to scream
but my tounge is still tied
expecting of her

I just want to express my love
but my heart is sinking
fearing of her denial

नाराजगी जायज है


हर किसी के नाराजगी के मायनों
 में अंतर होता है

कुछ लोगों की नाराजगी में
गुस्सा होता है

कुछ लोगों की नाराजगी में
इनकार होता है

कुछ लोगों की नाराजगी में
तकरार होती है

कुछ लोगों की नाराजगी में
दुविधा होती है

पर नाराजगी उन्ही से होती है
जिनकी हमें फिक्र होती है

नाराज होने वाले लोग
पर ये समझते क्यूँ नही
कि कहने वाले कि कोई मजबूरी थी
वरना वो हर बार ऐसी बात कहते तो नही !

ऊपर वाले की दुनिया


ऊँची इमारतों चमकते शीशों में बंद
एक दुनिया है
फुटपाथ के किनारे चिथड़ों में लिपटी
एक दुनिया है
दूरी है चंद क़दमों की
पर अंतर है युगों युगों  का
कहीं चाँद पर जाने की तैयारी है
कही भूख की बीमारी है
कही उचटती निगाहों से
कई सकुचाती निगाहों से भरी
एक दुनिया है
पर साँझ ढले हलके धुधलके में
निकलती है बच्चों की रेल दोनों दुनिया से
बनता है कोई गाडी और कोई सवारी
देख बच्चों की गाड़ी लगता है
शायद यही ऊपर वाले की दुनिया है !

Friday, November 9, 2012

इस उम्र में बचपन


आज  की इस दुनिया में
स्वार्थ की इस दौड़ में
खोकर अपनी मासूमियत
जिंदगी उम्र से पहले बड़ी हो जाती है !
इस समय इस उम्र में
तेरी बचपन जैसी मासूमियत
बच्चों जैसी हरकतें वो खिलखिलाहट
मुझे लुभाती है!
इस लुभावने स्वप्न में
तेरी ये ख़ूबसूरत आँखें
हाथों को थामकर चलने के लिए
मुझे बुलाती हैं !
पर जिंदगी के इस जंगल में
तुम्हारी यही मासूमियत
यही अनजानापन यही सादगी
मुझे डराती है !
फिर भी इन तपती राहों में
मेरी ये बेजार जिंदगी
तेरे बचपन की छाँव चाहती है !

Tuesday, August 14, 2012

स्वतंत्रता दिवस की पूर्व सांझ


स्वतंत्रता दिवस की इस पूर्व सांझ पर
जब मैं चारों और नजरें घुमाता हूँ
नजर आता है एक धुंधलका
खोये हुए चेहरे
भटके हुए लोग
दम तोडती उम्मीदें
दफने हुए आदर्श !

पर जब मैं ध्यान से सुनता हूँ
सुनाई देता है नेपथ्य में एक कोलाहल
हालात बदलने का
मुसीबतों से लड़ने का
अपने अधिकारों को पाने का
आदर्शों की नींव बनाने का !

इस कोलाहल को तीव्र करना होगा
धुंधलके को दूर करना होगा
पीछे हटने से कुछ नही होगा
आगे बढ़ स्वयं प्रकाश पुंज बनना होगा !

Monday, August 13, 2012

फूटी किस्मत


हर आँसू पर
क्या उसका नाम लिखा था
हर काँटों की डगर पर
क्या उसका नाम लिखा था
पैदा होने से पहले मौत पर भी
क्या उसका नाम लिखा था
भाई की झूठन पर भी
क्या उसका नाम लिखा था

उसके बचपन पर
घर का बोझ रखा था
उसकी किताबों पर
दहेज़ का बोझ रखा था
उसके सपनों पर
मर्यादा का बोझ रखा था
उसके जीवन पर
उपेक्षा का बोझ रखा था

इन काँटों पर भी चलकर
इस बोझ को भी उठाकर
हद तब हुई जब
उसकी फूटी किस्मत में
दहेज़ से जलना लिखा था !